राजस्थान की जलवायु


राजस्थान का जलवायु आम तौर पर शुष्क या अर्ध-शुष्क है और वर्ष भर में काफी गर्म तापमान पेश करता है, साथ ही गर्मी और सर्दियों दोनों में चरम तापमान होते हैं। भारत का यह राज्य राजस्थान उत्तरी अक्षांश एवं पूर्वी देशांतर पर स्थित है। उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव से मिलाने वाली रेखाएं देशांतर रेखाएं तथा देशांतर रेखाओं के अक्षीय कोण अथवा पृथ्वी के मानचित्र में पश्चिम से पूर्व अथवा भूमध्य रेखा के समानांतर रेखाएं खींची जाती हैं उन्हें अक्षांश रेखाएं कहा जाता है।

    राजस्थान का अक्षांशीय विस्तार 23°3 उत्तरी अक्षांश से 30°12 उत्तरी अक्षांश तक है तथा देशांतरीय विस्तार 69°30 पूर्वी देशांतर से ७८°१७ पूर्वी देशांतर तक है। राजस्थान की जलवायु शुष्क से उपआर्द्र मानसूनी जलवायु है अरावली के पश्चिम में न्यून वर्षा, उच्च दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर निम्न आर्द्रता तथा तीव्रहवाओं युक्त जलवायु है। दुसरी और अरावली के पुर्व में अर्द्रशुष्क एवं उपआर्द्र जलवायु है।

कर्क रेखा राजस्थान के दक्षिण अर्थात बांसवाड़ा जिले के मध्य (कुशलगढ़) से होकर गुजरती है इसलिए हर साल 21 जून को राजस्थान के बांसवाड़ा जिले पर सूर्य सीधा चमकता है। राज्य का सबसे गर्म जिला चुरु जबकि राज्य का सबसे गर्म स्थल जोधपुर जिले में स्थित फलोदी है। इसी प्रकार राज्य में गर्मियों में सबसे ठंडा स्थल सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू है इसलिए माउंट आबू को राजस्थान का शिमला कहा जाता है। पृथ्वी के धरातल से क्षोभ मंडल में जैसे-जैसे ऊंचाई की ओर बढ़ते हैं तापमान कम होता है तथा प्रति 165 मीटर की ऊंचाई पर तापमान 1 डिग्री सेल्सियस कम हो जाता है। राजस्थान का गर्मियों में सर्वाधिक दैनिक तापांतर वाला जिला जैसलमेर है जबकि राज्य में गर्मियों में सबसे ज्यादा धूल भरी आंधियां श्रीगंगानगर जिले में चलती है राज्य में विशेषकर पश्चिमी रेगिस्तान में चलने वाली गर्म हवाओं को लू कहा जाता है।

राजस्थान में गर्मियों में स्थानीय चक्रवात के कारण जो धूल भरे बवंडर बनते हैं उन्हें भभुल्या कहा जाता है गर्मियों में राज्य के दक्षिण पश्चिम तथा दक्षिणी भागों में अरब सागर में चक्रवात के कारण तेज हवाओं के साथ चक्रवाती वर्षा भी होती है राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान में गर्मियों में निम्न वायुदाब की स्थिति उत्पन्न होती है फलस्वरूप महासागरीय उच्च वायुदाब की मानसूनी पवने आकर्षित होती है तथा भारतीय उपमहाद्वीप के ऋतु चक्र को नियमित करने में योगदान देती है। राजस्थान में मानसून की सर्वप्रथम दक्षिण पश्चिम शाखा का प्रवेश करती है अरावली पर्वतमाला के मानसून की समानांतर होने के कारण राजस्थान में कम तथा अनियमित वर्षा होती है।

राज्य का सबसे आर्द्र जिला झालावाड़ है जबकि राज्य का सबसे आर्द्र स्थल सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू है जबकि सबसे शुष्क जिला जैसलमेर है। राज्य का दक्षिण पश्चिम दक्षिण तथा दक्षिणी पूर्वी भाग सामान्यतया आर्द्र कहलाता है। जबकि पूर्वी भाग सामान्यतया उप आर्द्र कहलाता है जबकि पश्चिमी भाग शुष्क प्रदेश में आता है इसके अलावा राजस्थान का उत्तर तथा उत्तर पूर्वी भाग सामान्यतया अर्ध अर्ध शुष्क प्रदेश में आता है।

राजस्थान के जलवायु प्रदेश  राजस्थान को जलवायु की दृष्टि से पांच भागों में बांटा है।

  1. शुष्क जलवायु प्रदेश(0-20 सेमी.)

  2. अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश(20-40 सेमी.)

  3. उपआर्द्र जलवायु प्रदेश(40-60 सेमी.)

  4. आर्द्र जलवायु प्रदेश(60-80 सेमी.)

  5. अति आर्द्र जलवायु प्रदेश(80-150 सेमी.)


शुष्क जलवायु प्रदेश श्रीगंगानगर जिले के दक्षिणी भाग क्षेत्र, जैसलमेर, उत्तरी बाड़मेर, बीकानेर व जोधपुर का पश्चिमी भाग आदि इस प्रदेश के अंतर्गत आते हैं इन सभी क्षेत्रों के मरुस्थलीय होने के कारण कम वर्षा तथा गर्मी अधिक पड़ती है। वर्षा की मात्रा 10 से 20 सेंटीमीटर होती है शीतकाल में यहां तापमान 11 डिग्री सेल्सियस तथा दैनिक तापमान 34 डिग्री सेल्सियस तक रहता है।

अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश वर्षा की अनिश्चितता अनियमितता एवं तूफानी तथा वर्षा की मात्रा 20 से 40 सेंटीमीटर ग्रीष्म ऋतु का तापमान 32 सेंटीमीटर से 36 सेंटीमीटर आदि प्रदेश की विशेषताएं है। इस क्षेत्र के अंतर्गत चुरू, गंगानगर, हनुमानगढ़, द. बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर का पूर्वी भाग, पाली, जालौर, सीकर,नागौर व झुझुनू का पश्चिमी भाग आते हैं यहां वनस्पति विकास एवं कंटीली झाड़ियां प्रमुख है।

उपआर्द्र जलवायु प्रदेश  इस प्रदेश के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र अलवर, जयपुर, अजमेर, पाली, जालौर, नागौर, झुझुनू का पूर्वी भाग, टोंक, भीलवाड़ा व सिरोही का उत्तरी-पश्चिमी भाग आते  हैं। यहां वर्षा का वार्षिक औसत 40 से 60 सेंटीमीटर है ग्रीष्म ऋतु का तापमान 27 डिग्री सेंटीमीटर से 34 डिग्री सेंटीमीटर तक तथा शीत ऋतु में 18 डिग्री सेंटीमीटर से दक्षिण क्षेत्र में एवं उत्तरी क्षेत्र में 12 सेंटीमीटर रहता है यहां की वनस्पति सघन, विरल प्रकार की है।


आर्द्र जलवायु प्रदेश   भरतपुर, धौलपुर, कोटा, बुंदी, सवाईमाधोपुर, उ.पू. उदयपुर, द.पू. टोंक तथा चित्तौड़गढ़ इस जलवायु प्रदेश के अंतर्गत आते हैं। यहां वर्षा की मात्रा 60 से 80 सेंटीमीटर होती है गर्मियों का औसत तापमान 32 डिग्री सेंटीमीटर से 35 डिग्री सेंटीमीटर एवं शीतकाल में 14 डिग्री सेंटीमीटर से 17 डिग्री सेंटीमीटर तक जाती है ।

अति आर्द्र जलवायु प्रदेश  अति आर्द्र जलवायु प्रदेश जलवायु प्रदेश के अंतर्गत बांसवाड़ा, झालावाड़, कोटा का दक्षिणी पूर्वी भाग उदयपुर का दक्षिणी पश्चिमी भाग एवं आबू पर्वत का सीमांत क्षेत्र आदि आते है। इस क्षेत्र में वर्षा 80 से 150 सेंटीमीटर तक होती है। अतः यहां की वनस्पति सघन एवं सदाबहार है।


वनस्पति के आधार पर जलवायु वर्गीकरण    डॉ. बलादिमीर कोपेन ने राजस्थान की जलवायु को चार जलवायु प्रदेशों में बांटा ।


  1. Aw- या (उष्णकटिबंधीय आद्र जलवायु प्रदेश) -:  राज्य के दक्षिणी भाग डूंगरपुर और बांसवाडा जिलों के अंतर्गत आते हैं  ।
  2. BSHW या (अर्ध शुष्क प्रदेश)-:राजस्थान के सर्वाधिक भाग में पाई जाती है राज्य के चूरु नागौर सीकर झुंझुनूं जोधपुर बाड़मेर पाली सिरोही इसके अंतर्गत आते हैं।
  3. Bwhw ( जलवायु प्रदेश या शुष्क उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश)- इसके अंतर्गत राज्य के श्री गंगानगर हनुमानगढ़ बीकानेर जैसलमेर जोधपुर जिले का उत्तरी पश्चिम भाग्य के अंतर्गत आता है।
  4. Cwg प्रदेश (उप आद्र प्रदेश) – अरावली के दक्षिणी पूर्वी जिले इसके अंतर्गत आते हैं।

जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

  1. समुद्रतल से दुरी
  2. अक्षांशीय स्थिती
  3. समुद्र तल से ऊंचाई
  4. अरावली पर्वत श्रेणियों कि स्थिति
  5. धरातलीय स्थिति
  6. मृदा की संरचना

समुन्द्र तल से दूरीभारतीय उपमहाद्वीप के आंतरिक भाग में स्थित होने के कारण राज्य की जलवायु पर सामुंद्रिक स्थिति का प्रभाव नही पड़ता है इसी कारण राजस्थान कु जलवायु उपोष्ण जलवायु है ।


अक्षांशीय स्थिती राजस्थान अक्षांशीय एवं देशांतरीय विस्तार के आधार पर शीतोष्ण जलवायु वाला क्षेत्र है । परंतु राज्य के दक्षिण अर्थात डूंगरपुर एवं बांसवाडा से कर्क रेखा गुजरती है जिससे यह क्षेत्र उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाला क्षेत्र है । इस प्रकार राजस्थान का दक्षिणी भाग ” उष्ण कटिबंधीय ” जलवायु वाला क्षेत्र एवं बाकी क्षेत्र ” उपोष्ण कटिबंध ” वाला क्षेत्र है ।

समुद्र तल से ऊंचाई जो भाग समुंद्रतल से जितना ऊंचा होगा वहां की जलवायु ठंडी होगी ।

अरावली पर्वत श्रेणियों कि स्थिति राज्य में अरावली पर्वत माला का विस्तार दक्षिण – पश्चिम से उत्तर – पूर्व की ओर है जो अरब सागरीय मानसून के समान्तर है । इस कारण राज्य में अधिक वर्षा नही हो पाती है ।राज्य में वर्षा दक्षिण – पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा से होती है । जिससे राज्य में अरावली पर्वत माला के पूर्व में वर्षा अच्छी होती है जबकि पश्चिमी भाग में न्यूनतम वर्षा होती है।

धरातलीय स्थिति राजस्थान की धरातलीय ऊंचाई 370 मी. से कम है एवं अरावली पर्वतमाला और दक्षिण – पूर्व क्षेत्र की धरातलीय ऊंचाई 370 मी. से अधिक है ।
 

मृदा की संरचनाराज्य के पश्चिमी भाग में रेतीली एवं मोटे कणों वाली मिट्टी पायी जाती है जो दिन में बहुत जल्दी गर्म एवं रात में बहुत जल्दी ठंडी हो जाती है इसलिए जैसलमेर में सर्वाधिक दैनिक तापान्तर पाया जाता है । इसके विपरीत पूर्वी एवं दक्षिणी – पूर्वी राज्य में चिकनी दोमट व काली मिट्टी पायी जाती है जिसके कण बहुत हल्के होते है यह मिट्टी बहुत धीरे गर्म व बहुत धीरे ठंडी होती है इसलिए इस क्षेत्र की जलवायु आर्द्र बनी रहती है ।

राजस्थान में जलवायु का अध्ययन करने पर तीन प्रकार की ऋतुएं पाई जाती हैः-
  1. ग्रीष्म ऋतु: (मार्च से मध्य जून तक)
  2. वर्षा ऋतु : (मध्य जून से सितम्बर तक)
  3. शीत ऋतु : (नवम्बर से फरवरी तक)
                 

ग्रीष्म ऋतु: राजस्थान में मार्च से मध्य जून तक ग्रीष्म ऋतु होती है। इसमें मई व जून के महीने में सर्वाधिक गर्मी पड़ती है। अधिक गर्मी के वायु मे नमी समाप्त हो जाती है। परिणाम स्वरूप वायु हल्की होकर उपर चली जाती है। अतः राजस्थान में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है परिणामस्वरूप उच्च वायुदाब से वायु निम्न वायुदाब की और तेजगति से आती है इससे गर्मियों में आंधियों का प्रवाह बना रहता है।

 इस काल में तापमान में वृद्धि का कारण सूर्य का उत्तरायण होना अर्थात इस समय सूर्य लंबवत स्थिति में चमकता है। वायु दबाव कम एवं तापमान अधिक होना इस ऋतु की प्रमुख विशेषताएं राज्य का वार्षिक तापांतर 14 डिग्री सेल्सियस से 17 डिग्री सेल्सियस के मध्य रहता है दोपहर के समय 36 डिग्री तापक्रम रहता है तथा तीसरे पहर (दोपहर) के बाद का तापक्रम 41 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है।

वर्षा ऋतु : राजस्थान में वर्षा ऋतु मध्य जून से अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक वर्षा होती है।

बंगाल की खाड़ी का मानसून मानसून राजस्थान में पूर्वी दिशा से प्रवेश करता है। पूर्वी दिशा से प्रवेश करने के कारण मानसूनी हवाओं को पूरवइयां के नाम से जाना जाता है यह मानसून राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा करवाता है इस मानसून से राजस्थान के उत्तरी, उत्तरी-पूर्वी, दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्रों में वर्षा होती है।

अरब सागर का मानसून मानसून राजस्थान के दक्षिणी-पश्चिमी दिशा से प्रवेश करता है यह मानसून राजस्थान में अधिक वर्षा नहीं कर पाता क्योंकि यह अरावली पर्वतमाला के समान्तर निकल जाता है। राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का विस्तार दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व कि ओर है यदि राज्य में अरावली का विस्तार उत्तरी-पश्चिमी से दक्षिणी-पूर्व कि ओर होता तो राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्र में वर्षा होती। राजस्थान में सर्वप्रथम अरबसागर का मानसून प्रवेश करता है ।

भूमध्यसागरीय मानसून मानसून राजस्थान में पश्चिमी दिशा से प्रवेश करता है। पश्चिमी दिशा से प्रवेश करने के कारण इस मानसून को पश्चिमी विक्षोभों का मानसून के उपनाम से जाना जाता है। इस मानसून से राजस्थान में उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में वर्षा होती है। यह मानसून मुख्यतः सर्दीयों में वर्षा करता है सर्दियों में होने वाली वर्षा को स्थानीय भाषा में मावठ कहते हैं यह वर्षा गेहुं की फसल के लिए सर्वाधिक लाभदायक होती है। इन वर्षा कि बूदों को गोल्डन ड्रोप्स या सोने कि बुंद के उप नाम से जाना जाता है।

शीत ऋतु : राजस्थान में नम्बर से फरवरी तक शीत ऋतु होती है। इन चार महीनों में जनवरी माह में सर्वाधिक सर्दी पड़ती है।शीत ऋतु में भूमध्यसागर में उठने वाले चक्रवातों के कारण राजस्थान के उतरी पश्चिमी भाग में वर्षा होती है। जिसे "मावट/मावठ" कहा जाता है। यह वर्षा माघ महीने में होती है। शीतकालीन वर्षा मावट को - गोल्डन ड्रोप (अमृत बूदे) भी कहा जाता है। यह रवि की फसल के लिए लाभदायक है।राज्य में हवाएं प्राय पश्चिम और उतर-पश्चिम की ओर चलती है।

राजस्थान को कृषि की दृष्टि से निम्न लिखित दस जलवायु प्रदेशों में बांटा गया है।
  1. शुष्क पश्चिमी मैदानी
  2. सिंचित उत्तरी पश्चिमी मैदानी
  3. शुष्क आंशिक सिंचित पश्चिमी मैदानी
  4. अंन्त प्रवाही
  5. लुनी बेसिन
  6. पूर्वी मैदानी(भरतपुर, धौलपुर, करौली जिले)
  7. अर्द्र शुष्क जलवायु प्रदेश
  8. उप आर्द्र जलवायु प्रदेश
  9. आर्द्र जलवायु प्रदेश
  10. अति आर्द्र जलवायु प्रदेश


राजस्थान में प्रवेश करने वाली हवाओं के स्थानीय नाम
भभूल्या- इसका शाब्दिक अर्थ है वायु का भंवर मरुस्थल में निम्न वायुदाब की केंद्र के कारण स्थानीय स्तर पर बनने वाले भवंरो को स्थानीय भाषा में भभूल्या कहा जाता है ।

पश्चिमी विक्षोभ- शीतकाल में पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर चलने वाली भूमध्यसागरीय पवनों को पश्चिमी विक्षोभ कहा जाता है इन्हीं के कारण राजस्थान में मावठ होती है इन्हीं पवनों क्षोभ मे मंडल में 6 से 12 किलोमीटर की ऊंचाई पर जेट स्ट्रीम कहा जाता है इन पवनों का नाम जेट स्ट्रीम दूसरे विश्वयुद्ध के समय युद्ध विमान बी 32 जेट विमान के आधार पर रखा गया था।

पुरवइया – इसका शाब्दिक अर्थ होता है पूर्व दिशा की और चलनेवाली पवने राजस्थान में ग्रीष्मकाल के समय पूर्व दिशा से आने वाली बंगाल की खाड़ी के मानसून को पुरवइया पवन कहा जाता है ।

सिली- इसका शाब्दिक अर्थ होता है ठंडी पवने, शीतकाल के समय राजस्थान में पौष महीने में चलने वाली ठंडी पवनों को सिली कहा जाता है
तुवा- गर्म पवने, पश्चिमी राजस्थान मे चलने वाली पवनो को तुवा या तवा कहते है।
 
झाला- प. राजस्थान मे पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के कारण जो चमकती हुइ मृग मरीचिका दिखाई देती है उसे स्थानिय भाषा मे झाला कहते है ।

आथूणी- शाम के समय चलने वाली पवने इन्हे स्थानिय भाषा मे आथणी कहते है ।

अर्डाव- अर्थ चिल्लाना, पश्चिमी राजस्थान मे तेज के साथ आव करती हुई स्थानिय पवनो को अर्डाव कहते है अन्य नाम :- राज्य में उत्तर दिशा से प्रवेश करने वाली हवा को धरोड़ , धराऊ , उत्तरार्द्ध के नाम से जाना जाता है ।राज्य में दक्षिण दिशा से प्रवेश करने वाली हवा को लंकाऊ के नाम से जाना जाता है ।राज्य में पूर्व दिशा से प्रवेश करने वाली हवा को पुरवईया , पुरवाई , पुरवा , आगुणी के नाम से जाना जाता है । राज्य में पश्चिमी दिशा से प्रवेश करने वाली हवा को पच्छउ , पिछवाई , पिच्छवा , आथूणी के नाम से जाना जाता है ।